ईमानदारी का परिचय

चाहते हुए भी आशु अपने ईमानदारी का परिचय नहीं दे पाया। यह कहानी भी कुछ इस तरह प्रारंभ होती है। कोयले के व्यपारी का एक भरा-पूरा परिवार था।उनकी धर्मपत्नी लता एवं उनका इकलौता बेटा चन्ना ।
 
आशु उस व्यपारी के हवेली का दरबान था परन्तु रामचरण उसे ऐसा महसूस नहीं होने दिये कि वह केवल दरबान है बल्कि आशु को अपने घर का एक अभिन्न शदस्य मानते थे।
समय बीतता गया सरकारें बहुत से व्यपारों पर लगाम कसती चली गयी।

रामचरण के व्यपार पर भी इसका प्रभाव पड़ा।
जिस कारण रामचरण का व्यपार मानो दिन प्रतिदिन नम होता चला गया।
रामचरण के बहुत से कोशिशों के बाबजूद भी वह अपने व्यपार पर पहले की तरह धाक नहीं जमा पाया। दुर्भाग्यपूर्ण दीपों का त्योहार बहुत नजदीक था। बहुत से घरों में दियों की रोशनी जगमगा रही थी आँगन में चहल-पहल थी। परन्तु रामचरण अंदर स टूट रहा था मानो उन दिओं की रोशनी उसे धिक्कार रही हो।

और वहीं कहीं उनका इकलौता लड़का चन्ना आशु के साथ अपनी जीवन जीने में लगा पड़ा था। आशु हर तरह से चन्ना का ख्याल रख रहा था
बस यही बात रामचरण को सुकून देती थी और वो अपने से कहीं ज्यादा आशु की परिवरिश को तबज्जो देता था। और कहीं न कहीं लता भी इससे काफी संतुष्ट थी।

चन्ना की अब आशु के हाथों में थी, दोनों में काफी स्नेह भी था। चन्ना और आशु के बीच एक ऐसा संबंध था कि एक मुस्कुराहट आशु के होठों पर प्रारम्भ होती थी और चन्ना के होठों पर जा के खत्म होती थी।

उनके गहरे रिश्ते का कारण यही था कि आशु ने चन्ना को चलने से ले कर हँसना तक सिखाया था। रामचरण कि परस्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी यही कारण था कि घर में सब उदास थे केवल चन्ना और आशु को छोड़कर इन्हें भला क्या पता कि यह बनावटी लाभ-हानि चीज़ होती क्या है? 

ये तो बस जिंदगी को खुलकर जीना चाहते थे। पर इन्हें क्या पता यह समय इनसे इनकी खुशियाँ छीन लेगा। और वह एक दिन आ ही गया जब शरीर को आत्मा से अलग होना था। रामचरण अपने परिवार के साथ उस शहर से पलायन कर गया।
आशु भी निराश होकर अपने गाँव को लौट गया।
आशु अपने परिवार के साथ होकर भी नहीं था। समय बीतता चला गया आशु को अभी तक संतान की प्रप्ति नहीं हुई थी। 

वह खोया खोया सा रहने लगा,मानो आशु का शरीर बिना आत्मा का हो। समय ने करवट बदला और एक दिन अचानक आशु के आँगन में एक नवयुवक ने दस्तक दी। आशु बूढ़ा हो चला उसकी नजरें भी कमजोर हो गयी थी। कुछ क्षण बाद उस नवयुवक ने अपना परिचय दिया आखिरकार वो चन्ना ही था।

 यह सुनकर बहुत खुश हुआ। चन्ना अपने साथ ले जाने का प्रस्ताव आशु के सामने रखा। आशु मान गया और वो चन्ना के साथ शहर की ओर चल पड़ा। 

घर पहुँचते ही चन्ना जंहा एक तरफ निराश हुआ वही कहीं चन्ना खुश भी हुआ । निराश होने का यह कारण था कि उसके मालिक रामचरण स्वर्गसिद्धार गए और खुश होने का ये कारण था कि जिस चन्ना को ये इतना छोटा देखा था वह चन्ना बहुत बड़ा हो चुका था। और यहाँ तक कि उसकी शादी भी हो गई थी, उसका एक छोटा बच्चा भी था। इस परिवार फिर से इस तरह देखकर आशु बहुत खुश हुआ और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद किया।

चन्ना चाहता था कि जिस तरह आशु ने उसकी बचपन में परिवरिश की बिल्कुल उसी तरह उसके बेटे की भी करे। आशु को चन्ना के पिता रामचरण अपने घर का सदस्य मानते थे। दिन बीतता चला गया चन्ना का बेटा का परिवरिश आशु के कंधों पर था क्योंकि चन्ना को पूरा विश्वास था कि मेरे बच्चे की भविष्य एक योग्य व्यक्ति के कन्धों पर है। 

चन्ना अब निश्चिंत था,चन्ना अब अपनी नॉकरी पर ध्यान दे रहा था। एक दिन की बात है आशु चन्ना के पुत्र को बाहरी शैर के लिए ले गया । खेलते खेलते अचानक मौसम बदल गया ।
जोर की आंधी के साथ बारिश भी होने लगी 
आशु ने कमल के बहुत सारे फूल तालाब में देखे।
वह फूल बच्चे को देने के लिए तालाब में उतरा और वो फूल तोड़ने लगा। अचानक उसे आभास हुआ कि एक बार बच्चे को देख लेता हूं। 

वह बच्चे को देखने के लिए अचानक मुड़ा परन्तु बच्चा वहाँ नही था। वह घबरा गया और बच्चे की तलाश करने लगा। एक स्थान पर बच्चे के खिलौने मिले ये देखकर उसका मन और घबरा गया। अब वह घबराया हुआ हर वो स्थान पर तलाश करने लगा जंहा उस बच्चे को ले गया था।
वहाँ के सारे तालाबों में गोता लगाकर ढूढ़ने लगा पर बच्चे का कहीं अता पता नहीं था।

वह अपने आप को कोशने लगा। यह बात हवेली तक गई । चन्ना के मानो पैरों तले जमीन खिसक गई हो। चन्ना की पत्नी चीखी चिल्लाई और आशु को अपने बच्चे की चोर बताने लगी। आशु अंदर से टूट चुका था। वह अपने आप को जिम्मेदार मानता था। हवेली पर पुलिस आयी और आशु को गिरफ़्तार कर लिया। 

चन्ना ये सब कुछ देख रहा था, फिर उसने पुलिस से कहा आशु को जाने दो। यह सुनकर आशु और टूट गया और पछ्तावा होने लगा।
आशु अब अपने गाँव को लौट चुका था। इस बार भी मानो सिर्फ आशु गांव आया उसका आत्मा नहीं आत्मा मानो उस बच्चे साथ ही कही खो गया हो। आशु को जिंदगीभर इस बात का पछ्तावा रहा।

अचानक समय ने करवट बदला और आशु ने हमेशा-हमेशा के लिए आँख बंद कर ली।
आशु अपना ईमानदारी नहीं साबित कर पाया,क्योंकि उसके पास ज्यादा समय नहीं था।
वक़्त यह सब- कुछ कोने में खड़ा चुपचाप देख रहा था।

          धन्यवाद!!!🙏

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