मानव जीवन मे प्रेम का महत्व..
मानव जीवन भगवान का दिया हुआ,एक अभिन्न भेंट है। ईश्वर ने अपने कलाकृतियों में से मनुष्य अर्थात मानव प्रजाति को अत्यंत ही विवेकशील एवं रोचक रुप दिया है।
मनुष्य समाजरूपी वातावरण में रहकर एक-दूसरे से बातचीत करना,एक-दूसरे की सहायता करना, एक-दूसरे के सुख-दुःख साथ देना, एक-दूसरे से घृणा करना एवं एक-दूसरे से प्रेम करना। यह तमाम चीजें अर्थात आचरण मनुष्य समाज में लोगों के बीच रहकर सीखता है।
जिनमें से केवल प्रेम ही मनुष्य के आचरण, व्यवहार एवं जीवन-शैली को अत्यधिक प्रभावित करता है। वर्तमान समय के इस प्रतियोगितारूपी जीवन में मनुष्य केवल अपने प्रेम, लग्न एवं मेहनत से अपने कठिन से कठिन कार्य आसानी से पूरा कर लेता है। प्रेमतारूपी स्वर को सभी सुनना पसंद करते हैं, परन्तु जो व्यक्ति समाज में रहकर लोगों से प्रेमता से पेश नहीं आते। उन्हें अक्सर निराशा ही हाथ लगती है।
प्रेम रूपी सागर में सभी डूबना चाहते हैं, परंतु घृणारूपी वातावरण में कोई व्यक्ति नहीं रहना चाहता। वर्तमान समय में प्रेम एवं मधुरता से हर व्यक्ति अपने जटिल से जटिल कार्य किसी अन्य व्यक्ति की मदद से आसानी से करवा लेता है।
साहित्य के कवियों ने भी प्रेमता रूपी शीर्षक पे अपना-अपना अलग मत दिया है। कबीर ने भी अपने दोहों की माध्यम से प्रेमता को समझाने का प्रयत्न किया है। जैसे:- “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए, औरन को शीतल लगे,आपहु शीतल होए”।। जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि उद्धव जी ने भी अपने ज्ञान के माध्यम से गोपियों के दिल नहीं जीत पाए। अंततः गोपियों के समक्ष भी प्रेम की ही जीत हुई।
अतः हमें अपने जीवन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम की भावना अपने मन बनाये रखना चाहिए।
धन्यवाद.... आशुतोष
मनुष्य समाजरूपी वातावरण में रहकर एक-दूसरे से बातचीत करना,एक-दूसरे की सहायता करना, एक-दूसरे के सुख-दुःख साथ देना, एक-दूसरे से घृणा करना एवं एक-दूसरे से प्रेम करना। यह तमाम चीजें अर्थात आचरण मनुष्य समाज में लोगों के बीच रहकर सीखता है।
जिनमें से केवल प्रेम ही मनुष्य के आचरण, व्यवहार एवं जीवन-शैली को अत्यधिक प्रभावित करता है। वर्तमान समय के इस प्रतियोगितारूपी जीवन में मनुष्य केवल अपने प्रेम, लग्न एवं मेहनत से अपने कठिन से कठिन कार्य आसानी से पूरा कर लेता है। प्रेमतारूपी स्वर को सभी सुनना पसंद करते हैं, परन्तु जो व्यक्ति समाज में रहकर लोगों से प्रेमता से पेश नहीं आते। उन्हें अक्सर निराशा ही हाथ लगती है।
प्रेम रूपी सागर में सभी डूबना चाहते हैं, परंतु घृणारूपी वातावरण में कोई व्यक्ति नहीं रहना चाहता। वर्तमान समय में प्रेम एवं मधुरता से हर व्यक्ति अपने जटिल से जटिल कार्य किसी अन्य व्यक्ति की मदद से आसानी से करवा लेता है।
साहित्य के कवियों ने भी प्रेमता रूपी शीर्षक पे अपना-अपना अलग मत दिया है। कबीर ने भी अपने दोहों की माध्यम से प्रेमता को समझाने का प्रयत्न किया है। जैसे:- “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए, औरन को शीतल लगे,आपहु शीतल होए”।। जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि उद्धव जी ने भी अपने ज्ञान के माध्यम से गोपियों के दिल नहीं जीत पाए। अंततः गोपियों के समक्ष भी प्रेम की ही जीत हुई।
अतः हमें अपने जीवन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम की भावना अपने मन बनाये रखना चाहिए।
धन्यवाद.... आशुतोष
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