वर्तमान समय में हिंदी भाषा में उतार चढ़ाव

भारत देश का नाम सुनते ही हमारे मस्तिष्क में हिन्दी भाषा का नाम गूँज उठता है। इस बात का इतिहास भी गवाह है कि हिंदी भाषा का वर्चस्व हमेशा से ही भारत देश में रहा है।

भारत देश की पहचान हिंदी भाषा से ही होती है। भारत देश में विभिन्न जाति, धर्म के लोग रहते हैं परन्तु जब एकता की बात आती है तब एक हिंदी भाषा के ही माध्यम से हम भारतीय अपना परिचय देते हैं। 

कुछ वर्षों से हिंदी भाषा में हमे काफी उतार चढ़ाव देखने को मिला है। यदि हम अपने वतन से कहीं दूर दराज में रहते हैं अपने किसी निजी कारणों से या फिर अन्य कई कारणों से अगर उस जगह हमें हिंदी सुनने को मिले तो ऐसा लगता है जैसे जीने की इच्छा ही बढ़ गई हो।

अपने राष्ट्रीय भाषा सुनते ही एक अपनापन की भावना हृदय में उत्पन्न हो जाती है। कहीं न कही हम अपने भाषा को एक अहम तबज्जो देते हैं। हर एक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रीय भाषा एक मर्मस्पर्शी भाषा के रूप में उभर कर सामने आती है।

दिन प्रतिदिन हम अपने राष्ट्रीय भाषा को न तबज्जो देते हुए बल्कि अंतरराष्ट्रीय भाषा या फिर सम्पर्ककीय भाषा को तब्बजो दे रहे हैं। अगर हम समय के माँग कि दृष्टि से देखें तो यह पहलू हमे सही सा प्रतीत होता है, परन्तु एक तरफ हम कही न कहीं अपने अस्तित्व को मिटाते जा रहे हैं और साथ मे हम अपना मौलकिता भी खो रहे हैं।

इस दशक में हमें अपने राष्ट्रीय भाषा हिंदी का अस्तित्व बनाए रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। इसी कारणवश हम भारतीयों को 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाना पड़ता है। वर्तमान समय की स्थिति देखें तो हम लोग पश्चिमी संस्कृति को बड़ी आसानी से अपनाते जा रहे हैं। जिस कारण हिन्दी भाषा को अपना वर्चस्व की रखने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ रहा है।

पर कहीं न कहि अच्छी बात ये भी है कि हम आज भी अपने राष्ट्रीय भाषा  के साथ एक अटूट जुड़ाव महसूस करते हैं। और आशा करते हैं भविष्य में भी करते रहेंगे। 

समय के साथ साथ बदलाव जरूरी है परन्तु एक भारतीय होने के नाते हमारी प्राथमिकता ये बनती है कि हम अपने राष्ट्रीय धरोहर का अस्तित्व बचाये रखें उनका सम्मान करें ।।


धन्यवाद !!

आशुतोष




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