मानव जीवन

मानव जीवन का महत्व केवल अपने कर्तव्यों का पालन करना ही नहीं है,बल्कि असली मनुष्यता तो जन स्नेह, जन परोपकार, एवं जन सेवा ही है। दूसरों का परोपकार करना ही मानव जीवन का मूल आधार है। जब किसी माँ के गर्भाशय से एक शिशु का जन्म होता है। उस दौरान वह शिशु दुनिया की माया से वंचित रहता है, परन्तु हम कह सकते हैं, कि वह शिशु
लालचरहित, ईर्ष्यारहित, क्रोधरहित होता है, परन्तु आयु बढ़ने के साथ-साथ उस बालक में क्रोध, लालच, ईर्ष्या इत्यादि का संचार भी बढ़ने लगता है। हम कह सकते हैं, कि हमें भगवान के घर से एक अच्छे इंसान के रूप में भेजा जाता है, परन्तु  हम इस दुनिया में आते ही विभिन्न प्रकार की बुरी संगतों में जकड़ जाते हैं। जब किसी मनुष्य के जीवन में कुछ बुरा होता है,तो वह ईश्वर को जिमेवार ठहराते हैं, परन्तु उसे यह नहीं पता कि वह अपने परिस्थितियों का खुद जिम्मेदार है।
भगवान के घर से हमें एक अच्छे इंसान के रूप में भेजने के बाबजूद भी हम उनके नियमों का उल्लंघन करके माया का साथ देने लग जाते हैं। इन सभी रास्तों के अनुसरण करके ही मनुष्य अपनी मनुष्यता का पतन करवाने लग जाता है।
विभिन्न बुजुर्गों एवं विद्वानों के विचारों के द्वारा जन सेवा एवं ईश्वर सेवा दोनों को बराबरी का दर्जा दिया गया है।
अक्सर हम यह देखते हैं, कि परोपकारी मनुष्य ही समृद्धशाली एवं दृढ़शाली होते हैं। मनुष्य की मनुष्यता इसी में है, कि वह अपनी कर्तव्यों पर डटे रहें तथा जन सेवा की चिन्तन करें।
अर्थात लोक कल्याण की मानव का मूल आधार है।

:-आशुतोष नाथ झा

                               

                             धन्यवाद🙏

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